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Saturday, November 22, 2014

शहर

यूँ तो वादियाँ बहुत हसीन थीं वहाँ;
पर मेरा शहर मुझे बुलाता रहा। .

सोचा नींद में तो आराम होगा;
वहाँ भी ख़्वाब बन, साक़ी मुझे सताता रहा।

बहुत था शवाब वहाँ क़ुदरत का..
पर मेरे होंठ शराब ढूंढते थे। 

जितना दूर गया अपने शहर से;
उतना ही पास आता रहा।

जितने कान बंद किये मैंने;
उतना मैख़ाना बुलाता रह।

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