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Monday, November 24, 2014

पुराने दिन

वो ससुर की चुटकी, वो सास के ताने;
आज याद आ गए वो दिन पुराने।

जब उसके घर आई थी मेहमान बनकर;
और उसकी मुहब्बत ने मेज़बानी दे दी।

जब लड़कपन बदलते ही थे घर बदले;
और इश्क़ ने मुझे भी एक कहानी दे दी।

आज, जब वो सहमी सी, मेरे घर आएगी;
जब मुझे सास कहकर रुकेगी, मुस्कुराएगी..

नए रूप में फिर आएँगे वो गुज़रे ज़माने।
तभी याद आ गए वो दिन पुराने।

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Saturday, November 22, 2014

शहर

यूँ तो वादियाँ बहुत हसीन थीं वहाँ;
पर मेरा शहर मुझे बुलाता रहा। .

सोचा नींद में तो आराम होगा;
वहाँ भी ख़्वाब बन, साक़ी मुझे सताता रहा।

बहुत था शवाब वहाँ क़ुदरत का..
पर मेरे होंठ शराब ढूंढते थे। 

जितना दूर गया अपने शहर से;
उतना ही पास आता रहा।

जितने कान बंद किये मैंने;
उतना मैख़ाना बुलाता रह।

Friday, November 21, 2014

सुबह

मेरे गाँव में सुबह थोड़ा पहले आती है। 
माना, मद्धम चाल से, सुस्ताती हुई आती है, मगर पहले आती है।

जग चुके होते हैं लोग;
जब तुम सोने जाते हो.. 
चाय की चुस्की से नींद खोलते;
 जब तुम नशे में खोने जाते हो।

मेरे गाँव की अलसाई पर हंसने वालों..
कहते  हैं, तुम्हारा शहर सोता नहीं।
सोयेगा कैसे; बाहर धुआं, अंदर घुटन..
सोने का सामान कोई होता नहीं।

बस एक निःढाल सी करवट लिए पड़ जाती है..
जब तुम्हारे शहर में ज़िन्दगी और नहीं जग पाती है।
असल में, दिन नहीं  होता तुम्हारे यहां; बस एक अजीब धुंधलका रहता है।
हर वक़्त गहराता, एक धुंआ सा बहता है।

आखिर, सूरज की किरणें जब उसे भेद पाती हैं;
तब तुम्हारे कैलेंडर की तारीख़ें एक नया दिन बताती हैं।
फिर बढ़ जाती है ज़िन्दगी, हाथ-घड़ी में सुबह लिए..
पर वो पुरानी हो चुकी; नयी सुबह बस यहां आती है।

 तुम्हारे बदहवास दिन से पहले, नयी दुल्हन ये;
बाल बिखेरे, बीती रात का जश्न मनाती है।
 माथे सिन्दूरी लाली लिए, कुछ मुस्काती, कुछ अलसाती;
मेरे गाँव में सुबह थोड़ा पहले आती है।
 

Thursday, November 20, 2014

सुक़ून

रौशन हुआ ये आसमां; रौशन हुई सारी ज़मीं..
रौशन हुआ दिल का जहां; मेरी ज़ुल्मत तेरे नूर में बह गयी।

मेरा हर अँधेरा मिट गया; जब तू मिला तो नूर मिला..
जब तू मिला, राहें मिलीं; मंज़िल मिली, काफ़िला मिला।

मेरी स्याह रातों को सुबह का ज़रिया सा तू..
मेरी बर्फ साँसों को आग का दरिया सा तू।

जब तू मिला, तो सुरूर मिला;
वुज़ू मिला, सुक़ून मिला।

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Wednesday, November 19, 2014

इंतज़ार

लीजे, एक और जाम पीजे दिल ए बेक़रार का..
हज़रात,  आप भी मज़ा लीजे इंतज़ार का।

फिर एक रोज़ आपसे मुलाक़ात होगी..
कुछ पुरानी गुफ़्तगू , कुछ नई बात होगी।

तब लुत्फ़ उठाएंगे फ़िर किसी  इन्कार का, किसी इक़रार का..
तब तक,  हज़रात, आप भी मज़ा लीजे इंतज़ार का।

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Tuesday, November 18, 2014

नया रक़्स


फिर ले आया मैं, गुज़रे तराने तेरे दर पर।   
उन्हें गुनगुनाने, तुझको सुनाने, फिर आया इसी बहाने तेरे दर पर।
 
आ, फिर कोई नया रक़्स, मुझको सिखाने के लिए आ।
कुछ और सफर तै कर; कुछ नयी मंज़िलें पाने के लिए आ।
लबरेज़ हूँ मैं भी, तू भी; इश्क़ के रंग में।
ले, फिर आया मैं, फाग मनाने तेरे दर पर।

अब भी याद हैं वो अल्फ़ाज़, बस तेरे बिन जुबां पर नहीं आते।
आ, फिर वही ग़ज़ल, मेरे  संग गाने के लिए आ।
या छेड़ कोई नया सुर.. मुहब्बत का।
ऐ पर्दानशीं, देख.. मैं लाया हूँ साज़ सारे तेरे दर पर।  

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रक़्स: नृत्य