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Monday, July 13, 2015

बिस्तर

कोई नींद को चैन मांगता है, किसी को ख़ामोशी की दरकार..
हमने फुटपाथ पे मज़दूरों को बिना नींद के सो जाते देखा है।

यूँ भी, नज़ारों में बहुत फ़र्क नहीं है यहां और वहां;
दिखता है वही , कमरों की खिड़कीयों से, जो हमने सड़क किनारे देखा है।

और फिर, कैद नहीं होते, राहों पर गुज़र करने वाले;
हमने परछाइयों को घर से निकल कर तस्वीर हो जाते देखा है।  

बस एक हम नहीं रास्तों को दर बनाये बैठे;
और भी बेघरों को यहां बिस्तर लगाते देखा है। 

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Monday, November 24, 2014

पुराने दिन

वो ससुर की चुटकी, वो सास के ताने;
आज याद आ गए वो दिन पुराने।

जब उसके घर आई थी मेहमान बनकर;
और उसकी मुहब्बत ने मेज़बानी दे दी।

जब लड़कपन बदलते ही थे घर बदले;
और इश्क़ ने मुझे भी एक कहानी दे दी।

आज, जब वो सहमी सी, मेरे घर आएगी;
जब मुझे सास कहकर रुकेगी, मुस्कुराएगी..

नए रूप में फिर आएँगे वो गुज़रे ज़माने।
तभी याद आ गए वो दिन पुराने।

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Saturday, November 22, 2014

शहर

यूँ तो वादियाँ बहुत हसीन थीं वहाँ;
पर मेरा शहर मुझे बुलाता रहा। .

सोचा नींद में तो आराम होगा;
वहाँ भी ख़्वाब बन, साक़ी मुझे सताता रहा।

बहुत था शवाब वहाँ क़ुदरत का..
पर मेरे होंठ शराब ढूंढते थे। 

जितना दूर गया अपने शहर से;
उतना ही पास आता रहा।

जितने कान बंद किये मैंने;
उतना मैख़ाना बुलाता रह।