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Friday, November 21, 2014

सुबह

मेरे गाँव में सुबह थोड़ा पहले आती है। 
माना, मद्धम चाल से, सुस्ताती हुई आती है, मगर पहले आती है।

जग चुके होते हैं लोग;
जब तुम सोने जाते हो.. 
चाय की चुस्की से नींद खोलते;
 जब तुम नशे में खोने जाते हो।

मेरे गाँव की अलसाई पर हंसने वालों..
कहते  हैं, तुम्हारा शहर सोता नहीं।
सोयेगा कैसे; बाहर धुआं, अंदर घुटन..
सोने का सामान कोई होता नहीं।

बस एक निःढाल सी करवट लिए पड़ जाती है..
जब तुम्हारे शहर में ज़िन्दगी और नहीं जग पाती है।
असल में, दिन नहीं  होता तुम्हारे यहां; बस एक अजीब धुंधलका रहता है।
हर वक़्त गहराता, एक धुंआ सा बहता है।

आखिर, सूरज की किरणें जब उसे भेद पाती हैं;
तब तुम्हारे कैलेंडर की तारीख़ें एक नया दिन बताती हैं।
फिर बढ़ जाती है ज़िन्दगी, हाथ-घड़ी में सुबह लिए..
पर वो पुरानी हो चुकी; नयी सुबह बस यहां आती है।

 तुम्हारे बदहवास दिन से पहले, नयी दुल्हन ये;
बाल बिखेरे, बीती रात का जश्न मनाती है।
 माथे सिन्दूरी लाली लिए, कुछ मुस्काती, कुछ अलसाती;
मेरे गाँव में सुबह थोड़ा पहले आती है।
 

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