कोई नींद को चैन मांगता है, किसी को ख़ामोशी की दरकार..
हमने फुटपाथ पे मज़दूरों को बिना नींद के सो जाते देखा है।
यूँ भी, नज़ारों में बहुत फ़र्क नहीं है यहां और वहां;
दिखता है वही , कमरों की खिड़कीयों से, जो हमने सड़क किनारे देखा है।
दिखता है वही , कमरों की खिड़कीयों से, जो हमने सड़क किनारे देखा है।
और फिर, कैद नहीं होते, राहों पर गुज़र करने वाले;
हमने परछाइयों को घर से निकल कर तस्वीर हो जाते देखा है।
बस एक हम नहीं रास्तों को दर बनाये बैठे;
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